जबलपुर की गलियों से एमपीएल के स्टेडियम तक, प्रथम और सफ़िन के संघर्ष की कहानी

जबलपुर की गलियों से स्टेडियम तक: दो सितारों की उड़ान

जैसे ही जबलपुर सिंधिया कप के लिए तैयार हो रहा है, दर्शकों की निगाहें प्रोफेशनल खिलाड़ियों पर होंगी, लेकिन सबसे ज़ोरदार तालियां दो युवा खिलाड़ियों — सफ़िन अली और प्रथम उइके — के लिए गूंजेंगी, जिन्होंने न सिर्फ टीम में जगह बनाई है, बल्कि पूरे शहर का दिल जीत लिया है।

सफ़िन अली : सराफा से सिंधिया कप तक

संघर्ष की शुरुआत

सराफा, अलीगंज की तंग गलियों में पले-बढ़े सफ़िन अली का बचपन 12 लोगों के संयुक्त परिवार में बीता। पैसों की तंगी थी, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं थी। 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और क्रिकेट ही उनका सहारा बन गया।

बिना संसाधनों के बड़ा सपना

ना जूते थे, ना कोचिंग, फिर भी सफ़िन हर दिन 3 किलोमीटर साइकिल चलाकर अभ्यास करते थे। उधार की गेंदें और फटे जूते ही उनके साथी थे। मोहम्मद सिराज की जिद और विराट कोहली की आक्रामकता ने उन्हें प्रेरणा दी।

टीम में चयन और भावुक पल

जब जबलपुर रॉयल लायंस की टीम में उनका चयन हुआ, तो उन्होंने अपने पिता से कहा, “स्पाइक्स नहीं थे, लेकिन सपने थे।” पिता अश्फाक अली की आँखों में गर्व के आँसू थे, और बेटे को गले लगाकर उन्होंने सब कुछ कह दिया।

प्रथम उइके : शाहपुरा से शिखर की ओर

गांव से लेकर जेपी एकेडमी तक

शाहपुरा गांव के प्रथम के पिता एक ट्रैक्टर एजेंसी में काम करते हैं। प्रथम ने टेनिस बॉल क्रिकेट से शुरुआत की और रानीताल की जेपी एकेडमी तक का 30 किलोमीटर का सफर रोज़ तय किया।

संघर्षों भरा सफर

सुबह सूरज से पहले उठना, लंबा सफर और थकावट — लेकिन नेट्स में पूरी जान झोंक देना। प्रेरणा मिली डेल स्टेन और विराट कोहली से।

टैलेंट हंट में चमत्कार

टैलेंट हंट के दौरान उनकी गेंदबाज़ी ने चयनकर्ताओं को चौंका दिया। जब उनका नाम टीम में आया, तो उनके परिवार की आंखों में खुशी के आंसू थे।

लायंस की ताक़त: ज़मीन से जुड़े सितारे

जबलपुर रॉयल लायंस के प्रतिनिधि लव मलिक ने कहा, “यह टैलेंट हंट क्रिकेट से आगे की पहल थी – यह था उन युवाओं को मंच देना, जिनके पास आग थी लेकिन रोशनी नहीं।”

इन खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि सफलता के लिए महंगे संसाधन नहीं, बल्कि अडिग जुनून और आत्मविश्वास चाहिए होता है।