सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, शादी का वादा टूटना दुष्कर्म नहीं; आपसी सहमति के रिश्ते टूटने पर आपराधिक केस नहीं बनता

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, शादी का वादा टूटना दुष्कर्म नहीं; आपसी सहमति के रिश्ते टूटने पर आपराधिक केस नहीं बनता

सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज एफआइआर को रद करते हुए कहा है कि यह मामला आपसी सहमति से बने रिश्ते में बाद में उत्पन्न हुए मतभेदों का है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर वह रिश्ता जो विवाह तक नहीं पहुंचता, उसे स्वतः ही झूठे वादे या दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

क्या है मामला

बीवी नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि जब संबंध दोनों पक्षों की सहमति से बने हों, तो केवल उनके टूटने भर से आपराधिक मामला नहीं बनता। पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें आरोपित के खिलाफ फरवरी 2025 में बिलासपुर में दर्ज एफआइआर को रद करने से इनकार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी का वादा पूरा न होना अपने-आप में दुष्कर्म का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह स्पष्ट है कि यह सहमति से बना रिश्ता था, जो समय के साथ कड़वाहट में बदल गया। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत विवादों को सुलझाने के लिए राज्य की आपराधिक मशीनरी का सहारा लेने से बचना चाहिए।

कानूनी रूप से किसी अन्य से विवाह करने की पात्र नहीं थी

मामले के तथ्यों पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपित दोनों ही पेशे से वकील हैं। शिकायतकर्ता 33 वर्षीय विवाहित महिला है और एक बच्चे की मां भी है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जब महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका तलाक मामला लंबित था, तब वह कानूनी रूप से किसी अन्य से विवाह करने की पात्र नहीं थी।

अदालत ने कहा कि कानून द्विविवाह की इजाजत नहीं देता और एक वकील होने के नाते शिकायतकर्ता को यह स्थिति भली-भांति ज्ञात होनी चाहिए थी। पीठ ने यह मानने से इनकार किया कि शिकायतकर्ता कानून से अनजान थी या उसे शादी के बहाने संबंध बनाने के लिए छल किया गया।

आपराधिक मुकदमों में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई

कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए टूटे हुए रिश्तों को आपराधिक मुकदमों में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई। साथ ही यह भी कहा कि अदालतों को वास्तविक आपराधिक मामलों और केवल निजी मतभेद या मन बदलने के कारण दर्ज कराए गए मामलों में स्पष्ट अंतर करना चाहिए।

अदालत ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता कोई ऐसी महिला नहीं थी जो निर्णय लेने में अक्षम हो। इसलिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले विवेक का प्रयोग किया जाना चाहिए था। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को निराधार बताते हुए फरवरी 2025 में बिलासपुर में दर्ज एफआइआर और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद कर दिया।