ऐसा था आजादी के बाद का पहला बजट, खाली था खजाना और रेलवे की पटरी बंटवारे के जख्मों से उखड़ी थी

ऐसा था आजादी के बाद का पहला बजट, खाली था खजाना और रेलवे की पटरी बंटवारे के जख्मों से उखड़ी थी

Budget 2026: देश के आजाद होने के बाद चीजें बिल्कुल भी आसान नहीं थीं। बंटवारे ने भारतीय रेलवे को बुरी तरह झकझोर दिया था। रातों-रात रेल रूट अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में बंट गए। 1946-47 के दौरान कोयले की सप्लाई में भारी गिरावट आई, जिससे न केवल ट्रेनें चलाना मुश्किल हुआ, बल्कि बिजली उत्पादन और फैक्ट्रियां भी प्रभावित हुईं।

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद तो हुआ, लेकिन विरासत में उसे एक खाली खजाना और बंटवारे के गहरे जख्म मिले। देश का पहला बजट कोई साधारण वित्तीय लेखा-जोखा नहीं था, बल्कि एक बिखरते हुए देश को एकजुट करने और रेलवे को फिर से पटरी पर लाने की एक साहसिक कोशिश थी। बंटवारे ने भारतीय रेलवे को बुरी तरह झकझोर दिया था। रातों-रात रेल रूट अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में बंट गए।

1946-47 के दौरान कोयले की सप्लाई में भारी गिरावट आई, जिससे न केवल ट्रेनें चलाना मुश्किल हुआ, बल्कि बिजली उत्पादन और फैक्ट्रियां भी प्रभावित हुईं। मालगाड़ियों के डिब्बे (वैगन्स) जो पहले 10 दिन में लौटते थे, अब 14-15 दिन लेने लगे, जिससे माल ढुलाई की क्षमता लगभग आधी रह गई।

पाकिस्तान के साथ संपत्तियों का भी हुआ विवाद

रेलवे की संपत्तियों और कर्ज के बंटवारे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच भारी मतभेद था। भारत का तर्क ‘बुक वैल्यू’ पर आधारित था, जिससे भारत पर 660 करोड़ रुपये की देनदारी आती। वहीं पाकिस्तान ‘कमाई की क्षमता’ (Earning Capacity) के आधार पर बंटवारा चाहता था, जिससे भारत का बोझ बढ़कर 757 करोड़ रुपये हो जाता। यह विवाद इतना उलझा कि आखिरकार इसे ‘आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल’ तक ले जाना पड़ा।

1.26 लाख रेल कर्मचारियों ने पाकिस्तान से भारत आने का ऑप्शन चुना

बंटवारा केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जिंदगियों का भी था। आंकड़ों के अनुसार, लगभग 1.26 लाख रेल कर्मचारियों ने पाकिस्तान से भारत आने का विकल्प चुना। इतने बड़े पैमाने पर लोगों का तबादला, उनके परिवारों का पुनर्वास और उन्हें नई पोस्टिंग देना एक ऐतिहासिक चुनौती थी। दूसरी ओर, करीब 83,000 कर्मचारी भारत से पाकिस्तान चले गए। इस उथल-पुथल के बीच रेलवे लाखों शरणार्थियों को भी ढो रही थी, जिसके कारण सामान्य यात्री सेवाएं लगभग ठप हो गई थीं।

साढ़े सात महीने का ‘संकटकालीन’ बजट

आजाद भारत का पहला बजट पूरे साल का न होकर केवल साढ़े सात महीने (15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948) के लिए था। सरकार के सामने पहाड़ जैसा बोझ था—शरणार्थियों का पुनर्वास, दंगों से हुई तबाही और नया प्रशासन खड़ा करना। वेतन आयोग की सिफारिशों और कोयले की बढ़ती कीमतों ने रेलवे को घाटे में धकेल दिया था। मजबूरन, राजस्व जुटाने के लिए सरकार को रेल किराए और माल भाड़े में बढ़ोतरी करनी पड़ी।